Sunday, 2 September 2012

केदारनाथ से बद्रीनाथ, KEDARNATH TO BADRINATH


केदारनाथ से बद्रीनाथ  

तीसरे दिन सुबह 8 बजे सभी तैयार होकर बस मे बैठ गये. अब हमारी मंज़िल बद्रीनाथ धाम थी. मैंने ड्राइवर से पूछा, अब किस रास्ते से चलोगे? यहाँ से बद्रीनाथ जाने के लिए दो रास्ते थे पहला कुंड से चोपता होते हुए. दूसरा वापस रुद्रप्रयाग से है. मैं चोपता होकर जाना चाहता था क्योंकि चोपता की प्राक्रतिक सुंदरता के बारे में काफ़ी कुछ पढ़ रखा था. पर बंगाली बाबू रुद्रप्रयाग से चलने के लिए कह रहे थे. पर जब मैंने उन्हे समझाया तो वह राज़ी हो गये.
सीतापुर से चल कर ड्राइवर ने बस गुप्तकाशी में रोक दी बोला आप लोग उपर पहाड़ी पर मंदिर में जा कर दर्शन कर आए. थोड़ा सा चढ़ने के बाद सोचा कहाँ जाएँगे? फिर हिम्मत कर के मंदिर तक पहुँच ही गये. मंदिर के बाहर ही दो-चार पंडा बैठे थे. हम लोंगो को देख कर बोले पूजा की थाली ले ले. चलिए आपको पूजा करवा देते हैं. मैने भी सोंचा की धर्म-कर्म के लिए ही तो यहाँ आए हैं, वैसे भी इन पंडा पुजारी का खर्च भी तो हम लोगों की दान दक्षिणा से ही तो चलता है. केदारनाथ के कपाट खुलते समय भगवान की डोली, यहाँ इस मंदिर की परिक्रमा करके ही आगे बढ़ती है. गुप्तकाशी के मुख्य मंदिर के अंदर शिवलिंग स्थापित है साथ में ही केदारनाथ की छोटी प्रतिकृति भी विराजित है. मंदिर के सामने एक छोटा सा कुंड बना है इस कुंड में  अलग-अलग दो जल धाराएँ गिर रही है. वहाँ पंडा जी ने बताया कि बाई ओर की धारा से यमुनौत्री का जल आ रहा है और दाई ओर की धारा से गंगौत्री का जल निकल रहा है. मुख्य मंदिर के साथ में अर्धनारीश्वर का मंदिर है. भगवान शिव ने पांडवों को अर्धनारीश्वर के रूप में दर्शन दिए थे. यहाँ से पूजा के बाद हम आगे के लिए चल दिए. कुंड से आगे चोपता के मार्ग पर बढ़ते ही दोनो ओर हरे-भरे पेड़ों का जंगल नज़र आने लगा. यहाँ सड़क साफ अच्छी बनी हुई थी. ड्राइवर भी तेज़ी से बस चला रहा था. चोपता पहुँचते–पहुँचते, हमें अपने बाई ओर बर्फ़ से आच्छादित पर्वत श्रेणी दिखने लगी. ज्यों-ज्यों बस बढ़ रही थी, पर्वतों की चोटियाँ स्पष्ट होती जा रही थी. बहुत ही मनमोहक नजारा था. चोपता पहुँचने पर बस ड्राइवर ने बस रोक दी. सामने ही तुंगनाथ मंदिर जाने के लिए रास्ता था. सड़क के दोनो ओर बर्फ़ से ढकी चोटियाँ नज़र आ रही थी. चोपता के बारे में पढ़ा था, स्विट्ज़रलैंड ऑफ इंडिया है. कोई शक नहीं? हिन्दुस्तान में चोपता की प्राकृतिक सुंदरता नायाब है. कौसानी के बारे में महात्मा गाँधी ने स्विट्ज़रलैंड ऑफ इंडिया कहा था. वहाँ उन्होंने अपना आश्रम भी बनाया, परन्तु चोपता की सुंदरता के आगे कौसानी कहीं नही टिकता है. जो भी चोपता आता है वह यहाँ की खूबसूरती को भूल नहीं सकता. यहाँ पर हम लोग लगभग आधा घंटा रुक कर आस-पास के नज़ारे देखते रहे. हमने साथ के बंगाली बाबू से पूछा, क्यों जी यहाँ कैसा लग रहा है? कहाँ तो वह इस रास्ते से आना नही चाहते थे, पर अब यहाँ की सुंदरता देख कर बार-बार मेरे से कहने लगे, आपने बहुत अच्छा किया जो आप हमें इस रास्ते से ले आए वरना हमें पता ही नहीं चलता कि यह कितनी खूबसूरत जगह है?
चोपटा


चोपटा

चोपटा




चोपटा


चोपटा



तुंगनाथ से चमोली का रास्ता हरे-भरे जंगलों से घिरा हुआ है. इस रास्ते पर ज़्यादा वाहन नहीं चल रहे थे. हमलोग दोपहर दो बजे चमोली पहुँच गये. यहाँ ड्राइवर ने एक होटल के सामने बस रोकते हुए कहा कि सब लोग जल्दी से खाना खा लो. अगर हम 4 बजे तक जोशीमठ पहुँच जाए तो बद्रीनाथ जाने का मार्ग खुला मिल जाएगा. फिर हमें रास्ते में कहीं ना रुक कर सीधे बद्रीनाथ पहुँच जाएँगे. सभी ने 15 मिनट में दोपहर का भोजन किया और बस में बैठ गये. चमोली से बद्रीनाथ का मार्ग काफ़ी चौड़ा था. ड्राइवर तेज़ी से बस चला रहा था. गनीमत हुई की रास्ते में कोई बाधा नहीं आई और हम लोग 4 बजे जोशीमठ पहुँच गये. अभी बद्रीनाथ जाने का मार्ग खुला था. हमारी बस के निकलने बाद ही बद्रीनाथ जाने के लिए रास्ता बंद कर दिया गया. जोशीमठ से आगे का मार्ग संकरा है इस कारण दो-दो घंटे के इंटरवल से जोशीमठ से बद्रीनाथ जाने का मार्ग खोला जाता है.

चमोली से कुछ आगे ही हमें पाया कि सड़क के किनारे अलकनंदा पर कुछ अन्य विधुत परियोजनाओं पर काम चल रहा था. जोशीमठ से आगे बढ़ते ही हमें सड़क के किनारे लगे हुए jaypee के सैकड़ों बोर्ड नज़र आने लगे. हर एक बोर्ड पर बड़ा-बड़ा.” NO DREAM TOO BIG” jaypee लिखा हुआ था. ऐसा लग रहा था, अब हम किसी की प्राइवेट एस्टेट में से होकर गुजर रहे है. ज्यों-ज्यों हम विष्णु प्रयाग की ओर बढ़ रहे थे अलकनंदा में जल कम होता जा रहा था. विष्णुप्रयाग के पास तो अलकनंदा मे जल ही नहीं नज़र आ रहा था. विष्णुप्रयाग पहुँचने पर पता लगा की यहाँ पर jaypee ने अपनी विधुत परियोजना लगाई हुई है. इस कारण अलकनंदा का जल विष्णु प्रयाग में रोक रखा था. चारों ओर jaypee..” NO DREAM TOO BIG” के बोर्ड लगे थे . ऐसा लग रहा था कि हम पर ठठाकर हँस रहा है और कह रहा है कि देखो किस तरह हम प्रकृति का दोहन कर के इतने बड़े हो गये है अफ़सोस कि यह लोग हम सबकी इस जल संपदा का दोहन कर के हमें ही चिढ़ा रहे है. इन्ही विचारों को लिए हुए हम बद्रीनाथ धाम पहुँच गये. इस बार भी बाकि लोंगों ने तो उसी होटल में कमरा लिया जहाँ पर ड्राइवर ने बस रोकी थी पर हमने परमार्थ निकेतन में 4 बेड का एक कमरा 400 रुपये प्रति दिन के हिसाब से ले लिया. समान कमरे में रख कर हम सब मंदिर दर्शन के लिए चल दिए. रात हो चुकी थी मंदिर के बाहर लगी लाइटों से मंदिर प्रकाशित हो रहा था. मंदिर में भगवान बद्रीविशाल के रात्रि शयन की आरती होने जा रही थी. इसलिए मंदिर के अंदर नहीं जाने दे रहे थे. हम सब दूर से ही दर्शन कर के वापस आ गये.
 बद्रीनाथ  मंदिर   
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परमार्थ निकेतन की अपनी कैंटिन है, पर सीजन ना होने के कारण बंद थी. रात के खाने का इंतज़ाम करना था. परमार्थ निकेतन से बाहर कई होटल रेस्टोरेंट बने हुए थे. पर अधिकतर खाली थे. एक रेस्टोरेंट में जाकर खाना पैक करवाया. जब तक वह खाना तैयार करने लगा मैं वहीं बैठे एक पंडा से बात करने लगा. बातों ही बातों मे पता लगा कि वह वहीं पर एक दूसरी धर्मशाला के caretaker है. बोले हम तो आपको 200 रुपये में कमरा दे देते. मैंने कहा कोई बात नही. अब तो ले ही लिया है. वही सीजन के समय 2500 में भी नही मिलता है. बातों ही बातों में इस धाम ( बद्रीनाथधाम ) की चर्चा होने लगी, मैंने कहा सच तो यह है पंडित जी कि मुझे लगता है कि यहाँ तो केवल शुद्ध ह्रदय से भगवान बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आने वाले ही आ सकते है. पापी लोग तो यहाँ पहुँच ही नहीं सकते. बद्रीनाथ मंदिर से पहले देवदर्शनी है. यहाँ से मंदिर दिखने लगता है. देवदर्शनी के पास ही एकादशी का मंदिर है. कहते है माँ एकादशी यहीं प्रकट हुई थी.
यहाँ पहुँच कर अचानक मन में विचार आने लगे कि लोग क्यों झूठ, फरेब, धोखाधड़ी कर के पैसे कमाने की दौड़ में लगे हुए है? देखता हूँ लोग 60-70 और उससे भी अधिक उम्र के हो गये हैं पर लगे हुए हैं दौड़ में. मैं पूछता हूँ अरे किसके लिए यह सब कर रहे हो? सच तो यह है की सब कुछ तो यहीं छोड़ कर जाना है. लेकिन नहीं, लगे हैं कैसे किसको टोपी पहनाए?
सुबह चार बजे से ही कानों मे आस-पास के मंदिरों में हो रही आरती की आवाज़ गूंजने लगी. पर थकान के कारण सोते रहे. करीब 6 बजे सोकर उठे तो बाहर आकर देखा हमारे चारों ओर विशालकाय पर्वत खड़े हैं. इन पहाड़ों की चोटियों पर पड़ी वर्फ़ सूर्य की रोशनी में चमक रही थी. जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए चल दिए. जैसी की परम्परा है कि दर्शन से पहले मंदिर के नीचे बने हुए तप्त कुंड में स्नान किया जाता है.
 अलकनंदा पर बने इस पुल से मंदिर जाते है. 

 नीचे बने हुए तप्त कुंड

मंदिर मे दर्शन के लिए दूर तक बना टीन शेड 

हमारे लिए तो सब कुछ नया था. हम भी पूछते हुए वहाँ पहुँचे. यह एक छोटा सा टैंक था जिसमें कुछ लोग नहा रहे थे कुछ लोग बाहर बैठ कर मग से तप्त कुंड का पानी ले कर नहा रहे थे. तप्त कुंड का जल काफ़ी गर्म था. बाहर मौसम में ठंडक थी पर फिर भी तप्त कुंड का जल शरीर पर डाला नहीं जा रहा था. लोग इसके अंदर नहा रहे थे. तभी वहाँ नहा रहे लोगों ने बताया कि पहले जल को मग से अपने उपर डाले. जब शरीर सहने लायक हो जाये तो जल्दी से इस कुंड में उतर आए. मैंने ऐसा ही किया. वहीं लोगों ने बताया की गर्म जल सर पर ज़्यादा नहीं डालना चाहिए, वरना तबीयत खराब हो सकती है.

स्नान के बाद पूजा की थाली लेकर हम पहले आदिकेदार के दर्शन के लिए गये. कहते है , बद्रीविशाल के दर्शन से पहले आदिकेदार के दर्शन करना चाहिए. यह मंदिर तप्त कुंड से आगे बद्रीनाथ के मंदिर को जाते हुए मंदिर के बाई ओर बना हुआ है. यहाँ मंदिर में पत्थर पर श्री नारायण के पैरों के निशान बने हुए थे. यहाँ पूजा करके पुजारी जी से तिलक लगवा कर भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए गये. भगवान बद्रीविशाल पद्मासन में ध्यान मुद्रा में बैठे हुए हैं. मंदिर में भीड़ नहीं थी. वरना तो फटाफट दर्शन करो और बाहर निकलो. वहाँ गद्दी पर बैठे रावल जी बताने लगे की भगवान ध्यान मुद्रा में है. विग्रह स्पष्ट नहीं मंदिर भगवान के ललाट पर हीरा लगा हुआ है. दाहिनी ओर कुबेर और गणेश जी तथा बाई ओर उद्धव जी, नर-नारायण, गरूण जी, नारद जी, है. उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है मस्तक पर लगे हीरे को देख कर ऐसा लग रहा था की हरे रंग का नाईट बल्ब (जिसे आम बोलचाल में ज़ीरो वाट का वल्व कहते है) जल रहा हो, हम लोग थोड़ी देर वहाँ एक-टक निहारते रहे, तभी एक दंपति वहाँ विशेष पूजा के लिए आए. रावल जी मंत्रोचार करने लगे. हमें लगा कि इससे पहले, हमको बाहर जाने के लिए कहे, बाहर चलना चाहिए. भगवान के सामने से हट कर बाहर को निकलने लगा, कि तभी मंत्रोचर करते हुए रावल जी ने इशारे से अपने पास बुलाया और माथे पर चंदन का लेप प्रसाद के रूप में लगा दिया. मंदिर की परिक्रमा करके खड़ा हुआ ही था कि तभी एक साधू ने आ कर पूछा भगवान का प्रसाद लोगे, मन में आया नेकी और पूछ-पूछ, मैंने कहा क्यों नहीं महाराज साधु ने भगवान बद्रीविशाल को चढ़ने वाले केसर युक्त मीठे चावल का प्रसाद दिया. यहाँ चरणामृत केसरयुक्त मीठा था. बद्रीनाथ मंदिर के दाहिनी ओर लक्ष्मी जी, गणेश जी, हनुमान जी का मंदिर है.
  
बद्रीनाथ मंदिर



बद्रीनाथ मंदिर



मंदिर के पाट  लगभग छह माह बंद रहते है. बद्रीनाथ मंदिर के पाट बंद होने के बाद नारद जी भगवान की पूजा करते हैं. विशेष बात यह है  बद्रीनाथ मंदिर के पाट बंद करते समय जो ज्योति जलाई जाती है वह ज्योति पाट खोलते समय जलती हुई मिलती है.
बद्रीनाथ मंदिर


बद्रीनाथ की आरती 
श्री पवन मंद सुगंध शीतल , हेम मंदिर शोभितम्
निकट गंगा बहत निर्मल . श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
शेष सुमरिन करत निशदिन , धरत ध्यान महेश्वरम्
श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
शक्ति गौरी गणेश शारद ,नारद मुनि उच्चारणम्
वेद ध्यान अपार लीला ,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
यक्ष किन्नर करत कौतुक ,ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम्
श्री लक्ष्मी कमला चंवर डोले ,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
कैलाश में इक देवी निरंजन ,शैल शिखर महेश्वरम् 
राजा युधिष्ठर करत स्तुति।,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
श्री बद्रीनाथ के पंचरत्न ,पढ़त पाप विनाशनम् 
कोटि तीर्थ भए पुण्यों ,प्राप्ते फलदायकम्।

मंदिर से बाहर आकर पूजा की थाली दुकानदार को वापस की.  ध्यान आया ब्रह्मकपाल चलते है. पूछने पर पता लगा मंदिर से करीब 100 गज पीछे अलकनंदा के किनारे ब्रह्मकपाल  है. ब्रह्मकपाल के बारे में कथा है कि जब शिव जी ने ब्रह्मा जी का पाँचवा सिर काट दिया तो उन्हे ब्रह्महत्या लग गयी और वह सिर उनके हाथ में चिपक गया. बहुत कोशिश के बाद भी नहीं छूटा. शिव सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके जब इस स्थान पर आए तो यहाँ पर उनके हाथ से स्वयं सिर छिटक गया और शिव ब्रह्म हत्या से मुक्त हो गये. तब शिव जी ने कहा जो भी इस स्थान पर अपने पितरों का श्राद्ध और पिंड दान करेगा उसकी सात पीढ़ी तक मोक्ष को प्राप्त हो जाएँगी. तभी से इस स्थान का नाम ब्रह्मकपाल पड़ गया. कहते हैं कि इस स्थान पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने से प्राणी बार-बार के जन्म म्रत्यु के बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. यहाँ पर श्राद्ध में पहले मीठे चावल के पिंड बना कर अर्पण एक पंडा करवाते हैं, फिर ब्रह्मकपाल से नीचे स्थित ब्रह्मकुंड के पास जल से दूसरे पंडा तर्पण करवाते हैं, इसके बाद शुद्धि के लिए वापस ऊपर ब्रह्मकपाल के पास जाकर हवन द्वारा शुद्धि एक तीसरे पंडा करवाते हैं. पंडा ने बताया कि यहाँ पर श्राद्ध करने के बाद फिर कहीं भी श्राद्ध नही किया जाता है.

ब्रह्मकपाल के पास    अलकनंदा

ब्रह्मकपाल के पास    अलकनंदा

श्री नारायण अदृश्य रूप से अपने भक्तों को देखते हैं व उनका कल्याण करते हैं लेकिन इस स्थान पर वही लोग जा सकते हैं जिन्हें श्री हरि अपने पास बुलाते हैं. बद्रीनाथ धाम एक पुण्य भूमि है कहते हैं यहाँ जो भी ही श्रद्धा से आता है वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. इसलिए ही इस भूमि को भू-वैकुंठ कहते है. इस भूमि के बारे में कहा गया है कि यहाँ पर एक दिन के तप का लाभ 10000 वर्षों के तप के बराबर मिलता है, कहते हैं दानव सहस्रकवच ने सूर्य देव की तपस्या करके 1000 कवच प्राप्त किए थे. और एक कवच को वही तोड़ सकता था जिसने 10000 वर्ष तप किया हो. इस तरह से वह तीनों लोक में अजय हो गया. जब उसके कुकर्त्यों से मानव, देवता, ऋषि, मुनि सभी त्राहि-त्राहि करने लगे तब सभी भगवान श्री नारायण के पास पहुँच, सहस्रकवच को हराने के लिए यह ज़रूरी था कि आत्मचिंतन किया जाय, श्री नारायण ने चिंतन कर के जाना कि हिमालय पर केदार खंड में यही स्थान ऐसा है जहाँ एक दिन तपस्या करके 10000 वर्ष का फल प्राप्त होता है. वह इस स्थान पर आकर आत्म चिंतन में लीन हो गये. बाद में नर, नारायण के रूप में जन्म लिया. अलकनंदा के एक तट पर नर ने तपस्या की और अलकनंदा के दूसरे तट पर नारायण ने तपस्या की. जिस तट पर नर ने तपस्या की वह नर पर्वत कहलाया और जिस पर्वत के नीचे अलकनंदा के दूसरे तट पर नारायण ने तपस्या की वह नारायण पर्वत कहलाता है. बद्रीनाथ का मंदिर नारायण पर्वत पर स्थित है. सहस्रकवच जब युद्ध के लिए आया तब एक दिन नर युद्ध करते और उसका एक कवच तोड़ देते दूसरे दिन नर तपस्या करने बैठ जाते और सहस्रकवच से नारायण युद्ध करते और उसका एक कवच तोड़ देते . बारी-बारी से एक भाई तप करता तो दूसरा भाई युद्ध करता. इस तरह से उसके 999 कवच तोड़ दिए तब सहस्रकवच युद्ध भूमि से भाग कर सूर्य देव की शरण में चला गया.
कहते हैं यहाँ आकर भागवत कथा का श्रवण थोड़ी हो सके तो जरुर करना चाहिए. मैं जिस दिन 

बद्रीनाथ धाम से चल रहा था उसी दिन परमार्थ निकेतन में विशाल शामियाना श्रीमद् भागवत 

कथा के लिए लगाया जा रहा था. करीब 300 लोगों के एक सप्ताह ठहरने और भागवत कथा 

श्रवण का कार्यक्रम था. इस बार तो इस संयोंग का लाभ नहीं उठा पाया पर अगली बार अवश्य.  


वापस आकर हमने ड्राइवर से प्रोग्राम पूछा तो बोला आज ही वापस चलना है. मैंने कहा, आज तो चौथा दिन है पाँच दिन का टूर है तो कल चलना. बोला अभी आपको माना गाँव ले चलता हूँ उसके बाद वापस चलना है. एक दिन में बद्रीनाथ से हरिद्वार नहीं पहुँच सकते. बद्रीनाथ से माना गाँव 3 किलोमीटर की दूरी पर अलकनंदा के किनारे बसा हुआ है. मुश्किल से 10-15 मिनट में ही हम माना पहुँच गये. और इतनी सी दूरी के ड्राइवर ने हमसे 60 रुपये सवारी के हिसाब से अलग से ले लिया.
माना गाँव जिसे की पुराणों मे मणिभद्र पुरम के नाम से जाना जाता है. यहाँ से ही सरस्वती नदी के दर्शन होते है. कहते हैं की यहाँ से निकल कर वह भूमिगत हो जाती हैं बाद में इलाहाबाद में उनकी धारा दिखती है. मन में जिज्ञासा लिए हुए हम आगे बढ़े. यहाँ एक स्थान से दो रास्ते जा रहे थे एक गणेश गुफा के लिए दूसरा सरस्वती नदी के उदगम स्थल के लिए. हम पहले सरस्वती नदी के लिए गये. देखा पहाड़ के मध्य से सरस्वती की जल धारा निकल कर पतले से गलियारे में गिर रही है. साथ में ही सरस्वती देवी छोटा सा मंदिर है. वही पर एक चाय की दुकान है जिस पर लिखा है अंतिम चाय की दुकान. हम लोगों ने सरस्वती मंदिर में जाकर के दर्शन किए वहीं पास में एक बोर्ड लगा था केशव प्रयाग, अलकनंदा व सरस्वती का संगम.

माना गाँव का रास्ता 


माना गाँव 


माना गाँव



 सरस्वती नदी उदगम स्थल

 सरस्वती नदी  उदगम स्थल


 सरस्वती नदी  के पास भारत की अंतिम चाय की दुकान


भीम पुल 


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गणेश गुफा पर लगा शिला लेख


माना गाँव , ऊन से तैय्यार किए हुए कालीन


माना गाँव





मैंने दुकानदार से पूछा, मैंने तो पढ़ा है कि सरस्वती नदी यहाँ से निकल कर भूमिगत हो गयी है फिर यह अलकनंदा में कैसे मिल गयी. दुकानदार ने बताया की केशव प्रयाग में बहुत थोड़ा सा ही पानी अलकनंदा में मिलता है बाकी सारा भूमिगत हो जाता है. वहीं पर भीम पुल है. भीम पुल के साथ में एक साधु ने धुनी रमा रखी है. वहीं पर एक छोटी सी जलधारा बह कर सरस्वती में मिल रही थी. वहाँ पर लिखा था कि यह जलधारा मानसरोवर के जल की है. हमारे पास पानी की बोतल तो थी ही, हम सबने पहले तो उस जल को पिया फिर बोतल में भर कर साथ ले आया.
वहीं पर दो यूरोपियन पुरुष गेरुए वस्त्र में आए हुए थे. उनसे बात करने लगा, बहुत ही अच्छी हिन्दी वह लोग बोल रहे थे. बताने लगे जोधपुर में वह लोग किसी मठ में रहते हैं.
वापस हम उसी स्थान पर आए जहाँ से गणेश गुफा जाने का मार्ग था. थोड़ा सा आगे ही गणेश गुफा है. कहते है यहाँ पर बैठ कर गणेश जी ने महाभारत ग्रंथ का लेखन किया था. रचनाकार वेद व्यास जी थे. पहले तो यह पहाड़ के बीच में गुफा थी पर अब वहाँ पर एक छोटा सा मंदिर बना दिया है. हम जब गुफा के अंदर पहुँचे, वहाँ से पानी बह रहा था. गणेश गुफा से आगे व्यास गुफा है. चढ़ाई चढ़ कर मैं और मेरी लड़की व्यास गुफा पहुँचे. मेरी पत्नी और लड़का गणेश गुफा के पास ही रहे. कैमरा उनके पास था इस कारण फोटो नहीं ले सका. वेद व्यास की गुफा के उपर एक चट्टान है जिस पर व्यास पोथी लिखा था. उसको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे विशालकाय ग्रंथों का पुलिंदा है. वहीं एक शिलालेख पर लिखा था, व्यास जी ने सत्तरह पुराणों की रचना की, पर उन्हे संतुष्टि नही मिली अंत में उन्होने अठारवाँ पुराण श्रीमद् भागवत की रचना की थी. व्यास जी के पुत्र शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को अंतिम समय में सुनाया था. गुफा छोटी सी पर साफ है जिसमें व्यास जी की प्रतिमा स्थापित है.
माना गाँव के लोग ऊन से तैयार किए हुए तरह-तरह के स्वेटर, कालीन आदि बेच रहे थे. वह यहाँ खेती भी करते हैं, हमारे ड्राइवर ने तो एक बोरा आलू का खरीद कर बस में रख लिया था.
बद्रीनाथ  धाम  
बद्रीनाथ  धाम  

हम लोग दो बजे बद्रीनाथ से वापस धर्मक्षेत्र के बाद कर्मक्षेत्र के लिए चल दिए. जाते समय ही हमने ड्राइवर को गरूड गंगा पर रुकने को कहा था पर तब तो वह रुका नहीं. मैंने दोबारा उसे याद कराया, लौटते समय वहाँ रुक कर चलना है. पीपलकोटि से पाँच किलोमीटर आगे
गरूड गंगा बहती है. यहाँ पर गरूड जी का मंदिर है. कहते है भगवान के बद्रीवन जाते समय गरूड जी यहीं रुक गये क्योंकि यहाँ गरूड जी के पसंद का भोजन सर्प. बहुतायत में थे. कहते हैं अगर किसी को कोई विषैला जीव काट लेता है उसे गरूड जी की प्रतिमा से स्पर्श करा दिया जाय तो उसका विष उतर जाता है. पढ़ा तो यह था , यहाँ पर लोग सर्पों के उन अवशेषों को जो कि पत्थरो के रूप में है. ढूँढते रहते हैं जिन्हे घर में रखने से घर में विषैले जीव-जन्तु का ख़तरा नहीं रहता है. ड्राइवर ने गरूण गंगा के पास बस रोकी. सड़क से नीचे गरूण गंगा बह रही थी. यहाँ पर लक्ष्मीनारायण का मंदिर है. उससे नीचे गरूण जी का मंदिर है. यहाँ पर हमसे पहले आए हुए एक परिवार वालों को पंडित जी पूजा किए हुए पत्थर दे रहे थे. मैंने भी उनसे लिए. हमारे साथ के बंगाली बाबू तो नदी के पास ढूंढ कर कुछ पत्थर ले आए.
हम जब नंद प्रयाग पहुँचे, अंधेरा ढल गया था. ड्राइवर ने यहीं रुकने का निर्णय किया पर पता लगा पिछले 2 दिनों से पानी नहीं आ रहा है होटल वालों ने ठहराने से मना कर दिया. अब 8 बजे के बाद ही हम कर्ण प्रयाग पहुँचे. यहाँ सड़क के किनारे एक होटल में केवल तीन कमरे ही खाली मिले दोनो बंगाली और एक गुजराती भाई ठहर गये. मुझे उस होटल वाले ने सामने के रेस्ट हाउस में 400 रुपये में एक कमरा देकर ठहराया. जब हम कमरे में पहुँचे तो देख कर सुखद आनंद आया कि साथ में ही एक नदी बह रही है. जिसकी कलकल की ध्वनि गूँज रही थी. सुबह उठ कर पता लगा कि यह तो पिंडर नदी है. होटल से आगे ही अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम था. सुबह के समय यहाँ से भी दूर पहाड़ों पर वर्फ़ से ढकी चोटी दिख रहीं थी संगम था. 

 अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम

 अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम

सब लोग तैयार होकर सुबह 8 बजे हरिद्वार के लिए चले. श्रीनगर से कुछ किलोमीटर पहले ड्राइवर ने बस रोक दी. पता लगा, पिछले 2 दिनों से आगे पहाड़ों से पत्थर टूट कर लगातार गिर रहे हैं रास्ता बंद है. गाड़ियाँ दूसरे रास्ते से जा रही थी जो की नियमित रास्ता नहीं था. हमारा ड्राइवर बोला मैं तो इस रास्ते से कभी गया नहीं हूँ, काफ़ी ख़तरनाक रास्ता है. हम लोगों ने कहा, जब सारे लोग अब उसी रास्ते से जा रहे हैं तो तुम्हे क्या परेशानी है? पता लगा परेशानी उसे यह थी की कुछ पैसे चाहिए थे. मतलब यह जो बोरा आलू का उसने खरीदा था वह उसे मुफ़्त का पड़ जाय . क्या करते मजबूरी थी. हमे हाँ करनी पड़ी. रास्ता काफ़ी संकरा था. सारा ट्रैफिक इस रास्ते पर आ जाने के कारण ट्रैफ़िक जाम भी हो रहा था. इस रास्ते पर चलते हुए डर भी लग रहा था. बहुत उँचे-उँचे पहाड़ो से होते हुए हमारी बस जा रही थी, कई जगह तो सड़क एकदम कच्ची मिट्टी की थी, डर लग रहा था कि इतने ट्रैफ़िक के वजन से अगर कहीं ढह गयी तो! सीधे सैकड़ों फ़ुट गहरी खाई में जाएँगे. हमने देखा की पहाड़ों को चोटी तक खेती हो रही है. विशालकाय पहाड़ों को सीढ़ी नुमा काट कर खेती की जा रही थी. इस रास्ते पर पेड़ तो बहुत कम थे. वैसे भी जब पहाड़ों को काट-काट कर खेती की जाएगी तो पेड़ तो बचेंगे कहाँ से? कोई बड़ी बात नही कि पेड़ों की जगह खेती करने से यहाँ भू-स्खलन ज़्यादा होता है. मुझे लगता है कि इस तरह पहाड़ों को काट कर खेती करना भी ग़लत है. और पहाड़ों मे सुरंग बना कर बाँध बनाना भी भू-स्खलन का बड़ा कारण है.

अब कुछ विशेष जानकारी बद्रीनाथ और केदारनाथ के बारे मे.
हरिद्वार से केदारनाथ 269 किलोमीटर है. हरिद्वार से ऋषिकेश 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से शिवपुरी 13 किलोमीटर, शिवपुरी से व्यासी 4 किलोमीटर, व्यासी से कौड़ियाला 17 किलोमीटर, कौड़ियाला से देव प्रयाग 36 किलोमीटर, देव प्रयाग से श्रीनगर 38 किलोमीटर, श्रीनगर से कैला सौर 10 किलोमीटर, कैला सौर से रुद्रप्रयाग 35 किलोमीटर, रुद्रप्रयाग से तिलवाडा 9 किलोमीटर, तिलवाडा से अगस्त मुनि 9 किलोमीटर, अगस्त मुनि से कुंड 19 किलोमीटर, कुंड से गुप्त काशी 8 किलोमीटर, गुप्त काशी से सोन प्रयाग 28 किलोमीटर, सोन प्रयाग से गौरीकुण्ड 5 किलोमीटर, गौरी कुंड से रामबाड़ा की चढ़ाई 7 किलोमीटर, रामबाड़ा से केदारनाथ 7 किलोमीटर कुल दूरी 269 किलोमीटर,
केदारनाथ धाम 11824 फिट की उँचाई पर है. गौरी कुंड 6500 फिट की उँचाई पर है. लगभग 5000 फिट की उँचाई 14 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर पूरी करनी होती है.
केदारनाथ से गोपेश्वर होकर बद्रीनाथ 230 किलोमीटर है.
हरिद्वार से बद्रीनाथ धाम की दूरी 302 किलोमीटर है,
हरिद्वार से ऋषिकेश 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से शिवपुरी 13 किलोमीटर, शिवपुरी से व्यासी 4 किलोमीटर, व्यासी से कौड़ियाला 17 किलोमीटर, कौड़ियाला से देव प्रयाग 36 किलोमीटर, देव प्रयाग से श्रीनगर 38 किलोमीटर, श्रीनगर से कैला सौर 10 किलोमीटर, कैला सौर से रुद्रप्रयाग 35 किलोमीटर, रुद्रप्रयाग से गौचर 10 किलोमीटर, गौचर से कर्णप्रयाग 10 किलोमीटर, कर्णप्रयाग से नंद प्रयाग 21 किलोमीटर, नन्दप्रयाग से चमोली 10 किलोमीटर, चमोली से पीपलकोटी 17 किलोमीटर, पीपलकोटी से जोशीमठ 13 किलोमीटर, जोशीमठ से विष्णुप्रयाग 12 किलोमीटर, विष्णु प्रयाग से गोविंद घाट 7 किलोमीटर, गोविंद घाट से पांडुकेश्वर 2 किलोमीटर, पांडुकेश्वर से बद्रीनाथ 23 किलोमीटर है
बद्रीनाथ धाम 11204 फ़ुट की उँचाई पर स्थित है.

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