Thursday, 12 February 2015

अनुपयोगी रेल सम्पति


यहाँ पर मै ध्यान दिलाना चाहता हूँ ; रेलवे की ऐसी सम्पत्तियों का ,  जिनका उपयोग करके रेलवे करोडो रूपये की आय कर सकती है।
इस देश में बहुत से ऐसे रेलवे स्टेशन हैं जो कि अब बंद हो चुके हैं।  कई रेलवे लाइन ऐसी है जिससे होकर अब रेल नहीं गुजरती है।  वर्षो से  इन  रेल लाइनो पर आवागमन बंद हो चुका  है।
यह सारी सम्पत्ति रेलवे की है लेकिन चूँकि अब उपयोग में नहीं हैं इसलिए लोगो ने उस पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया है।  उन पर लोगो ने अपने मकान बना लिए हैं।
यहाँ पर ऐसी ही रेलवे की दो सम्पत्तियो के बारे में जानकारी दे रहा हूँ।
उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में केरूगंज में रेलवे का माल भाड़ा ढोने के लिए एक स्टेशन था।  एक दूसरी रेलवे लाइन  चारखम्बा के पास थी ।
यह दोनों जगह मुख्य रेलवे स्टेशन से लगभग  4 -5  किलोमीटर या उससे कुछ अधिक  की दुरी पर हैं।  यह दोनों रेलवे लाइन बंद हुए कई वर्ष हो गए हैं।
बचपन में देखा था इन रेल लाइनो पर धुँआ उड़ाते हुए रेल इंजन का आना - जाना होता था , पहले यह रेल लाइने , शहर के बाहर से होकर गुजरा करती थीं।  जनसँख्या बढ़ने लगी , शहर का दायरा  भी बढ़ने लगा।
रेलवे लाइन जिन स्थानो से होकर गुजर रही है वह सारी जमीन रेलवे की है , रेलवे की इन जमीनो पर ,रेल पटरी के ऊपर लोगो कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। अपने घर तक बना लिए हैं।
सोंचने की बात है कि करीब 10 किलोमीटर लम्बी जगह की कितनी कीमत  होगी।
यह तो केवल एक शहर के बारे में मैंने लिखा है।  मै समझता हूँ ऐसे  सैकड़ो शहर होंगे जहाँ अंग्रेजो के ज़माने में रेलवे लाइन विछाई गई थी लेकिन अब उन पर कोई आवागमन  नहीं है और लोगो ने कब्ज़ा कर लिया है।
अगर रेलवे चाहे तो इस तरह की सम्पत्ति को बेच कर करोडो रूपये वसूल सकती है ; लेकिन लगता है रेलवे में किसी  भी अधिकारी के पास  इन   सम्पत्तियो पर ध्यान देने का समय नहीं है।
वह किराया - भाड़ा बढ़ा कर अपने खर्चो को पूरा करना ज्यादा आसान काम समझती है।

Sunday, 7 September 2014

शिर्डी के साईं बाबा


यह विचार कई बार दिमाग में कौंधता है कि शिर्डी के साईं बाबा  उर्फ़ चाँद मियाँ एक मुस्लिम फ़क़ीर थे पता नहीं किस तरह रातो - रात सनातन धर्म में प्रवेश कर गए और सनातन धर्म के  मंदिरो में उनकी मूर्ति स्थापित करके पूजा होनी शुरू  हो गई।  
देखा जाय तो भारतवर्ष में बहुत से पहुंचे हुए संत , महात्मा हुए हैं।  और  वह लोग करिश्माई व्यक्त्तिव के संत होते थे परन्तु किसी को भी सनातन धर्म में  भगवान के बराबर रख कर नहीं पूजा गया या जाता है ।  अपवाद केवल  शिर्डी के साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियाँ हैं ।
हालांकि बहुत से लोग इसे कांग्रेस की एक चाल मानते हुए शंकराचार्य के खिलाफ हो गए हैं।  वह इसे एक राजनीतिक साजिश मानते हैं ;परन्तु यह बात तो सभी को स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि लाखो लोगो को तो यह पता ही नहीं था कि असल में शिर्डी के साईं बाबा कौन  हैं।  उन्होंने एक सत्य से लोगो को अवगत कराया है।  इसके लिए मै बिना किसी लाग -लपेट  के उन्हें साधुवाद देता हूँ कि कम से कम उन्होंने इतनी हिम्मत तो दिखाई और एक सच सभी के सामने रखा वरना बहुत थोड़े से लोग ही इस सच्चाई को जानते थे।
वापस फिर उसी विषय पर आता हूँ कि आखिर कैसे उन्हें भगवान राम , कृष्ण , विष्णु , हनुमान जी के बराबर बैठा दिया गया।
इसे कहते हैं मार्केटिंग , बहुत अच्छी  मार्केटिंग की गई है उन्हें भगवान बनाने के लिए।
मै किसी भी साधू - संत , फ़क़ीर के खिलाफ नहीं हूँ ; परन्तु यह भी  तो स्वीकार नहीं किया जा सकता कि एक व्यक्ति की मूर्ति को  सनातन धर्म के  मंदिरो में  स्थापित करके भगवान राम , कृष्ण , विष्णु , हनुमान , या अन्य देवी - देवताओ  के बराबर पूजा की जाय।
आज के हालत यह हैं   कि शिर्डी , सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है।  लाखो लोग हर साल उनके दर्शन के लिए जाते हैं।  लाखो - करोडो रूपये का चढ़ावा वहाँ पर चढ़ता है।  कारण वही है कि जबरदस्त मार्केटिंग की गई है और इंसान तो लकीर का फ़क़ीर होता ही है।  एक से दूसरा , दूसरे  से तीसरा , और तीसरे  चौथा , इस  तरह से पिछले कुछ वर्षो में अप्रत्याशित रूप से सांई भक्तो की वृद्धि हुई है।
अब कुछ साईं भक्त  कहेंगे कि हमें वहाँ जाने से फंला - फंला फायदे हुए।  इसका सीधा सा जबाव है कि कष्ट तो हर मनुष्य के जीवन में आते हैं  और उनका निवारण भी एक समय अवधि के लिए तय है।  यह प्रकृति का नियम है।  कुछ लोगो का निवारण जल्द हो जाता है कुछ का देर से और इस बीच अगर कोई उसे किसी दरगाह या फ़क़ीर के पास मन्नत मांगने के लिए भेज देता है।  और यह वक्त वह होता है जबकि प्रकृति उसके कष्ट का निवारण  करने जा  रही होती है  तब मनुष्य यही समझता है कि उसके कष्ट का निवारण फलांने मंदिर , दरगाह या फ़क़ीर की दुआ से हुआ है जबकि यह सच नहीं है परन्तु उसका विश्वास उस मौलवी , फ़क़ीर पर अटूट हो जाता है और हर अपने मिलने वाले को वहाँ पर जाने के लिए प्रेरित करता है।  कुछ इसी तरह से सांई की भी मार्केटिंग की गई है जो कि अब सबके सामने है।
अंत में सच तो यह है कि मनुष्य कितनी भी मन्नते कर ले  , दरगाह होकर आ जाय या फ़क़ीर के पास चला जाय , जो कर्म के आधार पर कष्ट उसके लिए लिखे हैं उसे कोई भी खत्म नहीं कर सकता, टाल नहीं सकता ।  वह कष्ट तो उसे भोगने ही होंगे।  यही प्रकृति का न्याय है।   

Wednesday, 11 June 2014

माइग्रेन का आयुर्वेदिक इलाज


माइग्रेन का आयुर्वेदिक इलाज 
 मेरी जानकारी में  कुछ एक  ऐसे नुस्खे हैं जिनसे माइग्रेन से छुटकारा पाया जा सकता है।  आयुर्वेदिक  पद्धति से माइग्रेन के रोगी बहुत आसानी से ठीक हो जाते हैं। 

१. घरेलू उपचार में देशी गाय का ताजा घी सुबह-शाम दो  बूंद नाक में रुई से टपकाने से इस रोग में आराम होता है। 

२. पिसी हुई सफ़ेद मिर्च चौथाई चम्मच से भी कुछ कम , मिश्री या चीनी आधा चम्मच  , देशी घी आधा चम्मच , इन तीनो को मिला कर सुबह  नाश्ते से पहले खाये।  साथ में दूध या चाय भी ले सकते हैं।  पहले दिन से ही आराम महसूस होना शुरू हो जायेगा।  लगभग 10 से 15 दिन तक प्रयोग में ले।  

३. पोस्त दाना अर्थात खसखस एक चम्मच , 7 -8 मुनक्का बीज निकाल कर   , तरबूज के बीज एक चम्मच।  इन तीनो को रात में पानी में भीगा दे।  सुबह सिलबट्टे  पर  पीस ले। किसी छोटी कढ़ाई या पैन में  एक चम्मच देशी घी डाल कर ,  हल्का सा भून कर दूध के साथ सुबह नाश्ते से पहले खाए।  

४. सप्तामृत लौह किसी अच्छी आयुर्वेदिक दवाई बनाने वाली कम्पनी का ले।  एक से दो रत्ती , अगर गोली में है तो दो गोली सुबह -शाम देशी घी के साथ लेने से सभी तरह के मस्तिष्क विकारो से छुटकारा मिल जाता है।  
५. सुबह - सुबह योग करे , विशेष रूप  से अलोम -  विलोम 

६. अगर कब्ज की शिकायत रहती है तो एक चम्मच भर कर त्रिफला चूर्ण हलके गुनगुने जल से रात को सोने से पहले ले।  

यूं तो और बहुत से नुस्खे हैं परन्तु मै समझता हूँ कि इनमे से कोई एक - या दो को भी अगर अमल में लाएगा तो निश्चित रूप से उसे इस व्याधि से छुटकारा मिल सकता है।  

Wednesday, 4 June 2014

क्या गोपी नाथ मुंडे की आकस्मिक मृत्यु के लिए दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की कार्यप्रणाली भी जिम्मेदार है ?


कल बीजेपी नेता केंद्रीय मंत्री गोपी नाथ मुंडे की रोड एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई।  विभिन्न समाचार पत्रो में छपी खबरों  से पता लगा  कि घटना सुबह साढ़े छह बजे  की है।  उस समय रोड एकदम खाली थी।  रेड लाइट चल रही थी पर कोई पुलिस कर्मी   तैनात नहीं था।  मंत्री जी के ड्राइवर ने खाली सड़क देख रेड लाईट क्रास करने की चेष्टा की, तभी सामने से  इंडिका  कार आ रही थी। उसकी तरफ से ग्रीन लाइट थी। मुंडे की कार अचानक उसके सामने आ गई। इंडिका के ड्राइवर ने पूरी जोर से ब्रेक मारा, लेकिन तब भी कार घिसटते हुए मुंडे की कार से जा टकराई।

यह था कारण इस  एक्सीडेंट का।  अक्सर बहुत से एक्सीडेंट रेड लाईट के कारण ही होते हैं।  कुछ समय पहले मेरे घर के पास रहने वाले एक बहुत अच्छे दांतो के डाक्टर के साथ भी कुछ इसी तरह की घटना घटित  हुई थी।  वह रात के लगभग 11 -12  बजे दिल्ली में कहीं जा रहे थे ,  सड़क सुनसान थी , वह  रेड लाईट क्रॉस कर रहे थे , तभी एक्सीडेंट हुआ और वह कोमा में चले गए।  

अगर तिराहे या चौराहे पर ऐसे समय पर येलो लाईट जल रही हो तब लोग देखभाल कर सड़क पार करते हैं।  क्योकि उन्हें पता होता है कि इस समय ट्रैफिक कंट्रोल करने के लिए ट्रैफिक पुलिस नहीं है।   दिल्ली में अक्सर ऐसा देखने में आता है कि देर रात या बहुत सुबह भी रेड -ग्रीन लाइटे जल रही होती हैं ; हाँलाकि उस समय सड़को पर सन्नाटा पसरा होता है।  पुलिसवाले इनको चलता छोड़ कर चले जाते हैं।  ऐसे समय में इन लाइटों को चालू रखने का कोई अौचित्य नहीं है परन्तु क्या कर सकते हैं जबकि इतने पढ़े -लिखे अधिकारियो के दिमाग में यह बाते क्यों नहीं आती हैं।  
 इन्हे  तो पहले  यह समझना होगा कि इनको लगाया क्यों जाता है? पुलिस यह समझती है कि इन रेड लाईटो को लगा देंगे तो ट्रैफिक कंट्रोल हो जायेगा और एक्सीडेंट नहीं होंगे।  पर यह समझने को तैयार नहीं हैं कि जब सड़क पर ट्रैफिक ही बहुत कम या न के बराबर चल रहा है ऐसे समय पर इन्हे चालू रखना एक्सीडेंट को न्योता देना ही है।  
मैंने स्वयं इस बात को महसूस किया और अपने ग्वालियर यात्रा वृतांत में इस विषय पर लिखा भी था।  प्रस्तुत है  लेख के उस भाग के अंश।  

 "पाँच बजे से कुछ मिनट पहले ही  तैयार होकर  नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़ा।  इस समय अच्छा - खासा अँधेरा छाया हुआ था।  सड़क पर एक - दो लोग ही  आते जाते दिखाई दे रहे थे।   बहुत ही कम ट्रैफिक इस समय सड़क पर चल रहा था।  
 सुबह के समय की खाली सड़क पर बिना किसी रूकावट के मोहन नगर से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आधे घंटे में पहुँच गया।  हाँलाकि एक - दो जगह हमारे विद्वान पुलिसवालो ने रेड लाइट चालू कर रखी थी जिसका कि इस समय कोई औचित्य नहीं था।  ज्यादातर रेड लाइट को तवज्जो न देते हुए अपनी गाडी भगाए चले जा रहे थे और मै रेड लाइट  का सम्मान करता हुआ खड़ा सोंच रहा कहीं कोई पीछे से आकर ठोंक न दे।  लेकिन क्या किया जाय इन पुलिस वालो की सोंच का।  इनकी समझ को दाद देनी पड़ती है।  मै  समझता हूँ ऐसे समय पर दुर्घटना होने के ज्यादा चांस रहते हैं।"

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि पुलिस अपने कार्यप्रणाली का फिर से गम्भीरता से विचार करे तभी वह सही मायने में जनता का भला कर पायेगी।  

Monday, 14 April 2014

कल की चिंता क्यों


मनुष्य  हमेशा अपने भविष्य के लिए चिंतित रहता है।  वह  अतीत की सोचता है, भविष्य की सोचता है, क्योंकि डरता है वर्तमान से , वर्तमान के क्षण में जीवन भी है और मृत्यु भी। वर्तमान में ही दोनों है एक साथ है क्योंकि वह वर्तमान में ही मरेगा  और वर्तमान में ही जियेगा । न तो कोई भविष्य में मर सकता है और न भविष्य में जी सकता है।
क्या तुम भविष्य में मर सकते हो?  जब मरोगे, तब अभी और यहीं, वर्तमान के क्षण में ही मरोगे। आज ही मरोगे। कल तो कोई भी नहीं मरता। कल मरोगे भी तो कैसे?  कल क्या आता है कभी?  कल तो आता ही नहीं है। जब मर नहीं सकते कल में तो जियोगे कैसे?  कल का कोई आगमन ही नहीं होता। कल तो है ही नहीं। जो है वह अभी है और यहाँ है हमारे वर्तमान में , फिर कल की बात ही क्यों ? लेकिन फिर भी वह भविष्य में ही जीना चाहता है, भविष्य के लिए ही चिंतित है ; जबकि सत्य यही है की वह वर्तमान में जी रहा है।  

हमें अपने अतीत से  प्रेरणा लेनी चाहिए , भविष्य की योजनाएं बनाना चाहिए एवं वर्तमान का आनंद लेना चाहिए।  हम वर्तमान में जी रहे हैं इसलिए वर्तमान का आनंद लेना ही हमें जीवन जीने की कला सीखा सकता है।  अतीत की भटकन से दूर , भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है , उसके लिए जिज्ञासा न कर , वर्तमान को आनन्दमय बनाये।  यही है जीवन जीने की कला।  

Sunday, 13 April 2014

बीजेपी के वरिष्ठ नेताओ द्वारा मोदी की आलोचना का अर्थ क्या है


आज एक वक्तव्य पढ़ा कि देश में  मोदी की लहर नहीं , बीजेपी की लहर है।  मजे की बात यह है कि इस तरह के वक्तव्य देने वाले किसी अन्य पार्टी के न होकर बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी हैं।  सोंचने की बात है की जोशी जी को इस तरह का वक्तव्य देने की क्या आवश्यकता पड़  गई।  शायद उनका अहं उनको यह स्वीकार करने नहीं दे रहा है कि इस बार उन्हें  अपने से कम उम्र के व्यक्ति के नेतृत्व में चुनाव लड़ना पड़  रहा है।  एक बात यह भी है कि बीजेपी में मुरली मनोहर जोशी जैसे कई वरिष्ठ नेता हैं जिन्हे मोदी की लोकप्रियता से ईर्ष्या होने लगी है।  अभी पिछले दिनों ही उमा भारती  ने भी कुछ इसी तरह का वक्तव्य देकर चर्चा का विषय बना दिया था  कि मोदी में अटल जैसी भाषण देने कि कला नहीं है।  मुझे लगता है कि ज्यो - ज्यो मोदी की लहर आंधी में तब्दील होने लगी है इन वरिष्ठ नेताओ के पेट में दर्द होने लगा है।  इन्हे लगने लगा है कि अगर मोदी की सरकार बन गई तो इन जंग लगे नेताओ की छुट्टी तय है।  इनके  बड़बोलापन पर अंकुश लगना तय है इसलिए अपनी अहमियत दर्ज करने के लिए इस तरह की सोंची - समझी रणनीति अपना रहे हैं।
सही बात तो यह है कि मोदी के प्रादुर्भाव होते ही बीजेपी में रक्तसंचार होना शुरू हुआ है अन्यथा जिस तरह से एक के बाद एक बीजेपी के गढ़ ध्वस्त हो रहे थे उससे तो लग रहा था बीजेपी नेपथ्य में चली जाएगी।  पहले उत्तराखंड से बीजेपी की छुट्टी हुई , फिर हिमाचल और कर्नाटक भी हाथ से चले गए।
यह वह समय था जबकि लग रहा था कि बीजेपी अपना परचम फहरायेगी परन्तु उसके उलट कांग्रेस इन राज्यों में बीजेपी को हटा कर सत्ता में आ गई।
यह वह समय था जबकि हिंदुस्तान की जनता कांग्रेस के कुशासन से तंग आ गई थी , तभी तो अन्ना हजारे के लोकपाल के लिए एक जान सैलाब उमड़ पड़ा था।  ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी अपना बजूद नहीं कायम रख सकी और अपनी अंतर्कलह में ही फंसी रही ।
यह तो मोदी ही थे जिन्होंने इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी  गुजरात में अपना परचम लहराया।  अब  लोग मोदी में इस कुशासन से मुक्ति के लिए  उम्मीद की किरण देख रहे हैं; परन्तु बीजेपी के  इन  वरिष्ठ नेताओ का  आपसी द्वेष पार्टी के लिए आत्मघाती बनता जा रहा है।
यह प्रश्न बार - बार कौंधता है कि उस समय यह अडवाणी , जी , सुषमा जी , जोशी जी , उमा जी कहाँ थे जब बीजेपी के हाथो से राज्यों की सत्ता निकलते जा रही थी।  उस समय मुझे बहुत तकलीफ हुई थी कि किस तरह से एक के बाद एक घोटाले , केंद्र सरकार के , जनता के सामने आ रहे हैं , मंहगाई सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जा रही है परन्तु लोग फिर भी कांग्रेस को चुन रहे हैं।  इस पराजय के बाद निराश होकर मैंने एक लेख भी लिखा था जिसका शीर्षक था क्या प्रजातंत्र मूर्खो का शासन होता है।
आज जब मोदी के नेतृत्व में राजस्थान वापस मिल गया , मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ में विजय मिली दिल्ली में भी अगर केजरीवाल ने नौटंकी न की होती तो दिल्ली में भी बीजेपी की सरकार होती।  यह सब देख कर भी यह नेता गण अगर अपना स्वार्थ देख रहे हैं तो इनसे घृणित अन्य कोई कृत्य हो ही नहीं सकता।  मै समझता हूँ कि इन नेताओ पर , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही  इस तरह के बड़बोलेपन पर लगाम लगा सकती है।  

Thursday, 21 November 2013

ग्वालियर किले की ऒर भाग-3


अब हम दोनों को टैक्सी वाला सबसे पहले किला ले गया।  हाँलाकि जिस जगह से मैंने टैक्सी ली वहाँ से किला पास ही था पर अब तो टैक्सी कर चुके थे।
किले के बाहर टिकटघर बना हुआ है।  यहाँ पर आम भारतियों के लिए टिकेट पाँच रूपये का है और विदेशी नागरिक के लिए सौ रूपये का टिकेट  है।  पता नहीं ऐसा क्यों करती है सरकार।  शायद यह सोंच कर कि विदेशी बहुत पैसे वाले होते हैं तो मै  यही कहूंगा कि यह सरकार का भ्रम है।  वहीं पर एक - दो गाइड खड़े थे जो कि मुझसे गाइड करने के लिए कहने लगे। विदेशी युवती जिसका नाम Lauranne था जो कि फ़्रांस से भारत दर्शन के लिए आयी थी ,से पूछा तो उसने मना कर दिया शायद वह गाईड पर पैसे खर्च नहीं करना चाहती थी।  गाइड मुझे बताने लगा कि यह किला तीन मंजिला नीचे तक बना हुआ है।  विना  गाइड के अगर आप लोग जायेंगे तो केवल किले की दीवारे देखकर लौट आयेंगे।  जब तक  आप इस किले का इतिहास और इसके स्वर्णिम अतीत के बारे में नहीं जानेंगे तब तक आपका यहाँ आना सार्थक नहीं होगा। मुझे भी लगा गाइड यह बात तो सही कह रहा है।   मैंने उससे पूछा कितने पैसे लोगे तो 150 रूपये मांगे।  मैंने दोबारा उस विदेशी युवती से पूछा पर ऐसा लगा वह गाइड पर  पैसे खर्च करने के मूड में नहीं है।  मैंने गाइड को बोला कि मै 100 रूपये दे सकता हूँ।  यह विदेशी महिला मेरे साथ जरुर है पर यह कुछ भी खर्च नहीं करना चाहती है।  यह कह कर मै आगे बढ़ गया।  गाइड फिर मेरे साथ हो लिया और बोला ठीक है आप सौ रूपये दे देना अगर मेरा काम अच्छा लगे तो उस विदेशी युवती से मुखातिब होकर बोला कि आप की जो मर्जी हो दे देना।

महाराजा मानसिंह तोमर का किला 



किले में प्रवेश करते ही हम पहले एक दालान में पहुंचते हैं।  यहाँ पर खड़े होकर गाइड ने किले के इतिहास के बारे में बताना शुरू किया।  उसके अनुसार किले का निर्माण 500 वर्ष पूर्व राजा मानसिंह तोमर ने इस किले का निर्माण करवाया था।  जिनकी आठ रानियाँ थीं।  एक बार जंगल से शिकार करके लौटते समय रास्ते में उन्होंने देखा दो भैसे आपस में सींग से सींग लड़ाये लड़ रही हैं।  उनकी लड़ाई से  डर  से सहमे हुए लोग एक तरफ को रास्ता छोड़ कर खड़े हुए थे।  तभी एक बहुत ही सुन्दर गूजर युवती ने आकर उन दोनों भैंसो के सींग पकड़ कर अलग कर दिया।  राजा उस लड़की कि बहादुरी देख बहुत प्रभावित हुए और यह सोच कर कि इतनी बहादुर लड़की से जो संतान होगी वह भी बहुत बहादुर होगी ,  उससे शादी का प्रस्ताव रखा।  लड़की ने राजा  के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार करने की तीन शर्ते रखी।  जिसमे से पहली उसकी शर्त थी वह जंगल की खुली हवा में रही है इसलिए घूँघट नहीं करेगी।  दूसरी शर्त थी राजा जहाँ कहीं भी युद्ध के लिए जायेंगे वह उनके साथ जायेगी।  और तीसरी शर्त थी कि जिस रेवा नदी का पानी पीकर वह बड़ी हुई है वह उसी जल से स्नान करेगी और पियेगी।  राजा ने तीनो शर्त स्वीकार कर ली।  तीसरी शर्त थोड़ी कठिन थी क्योकि इतनी दूर  से नदी के पानी को किले की चढ़ाई पर लाना था।  इसके लिए राजा ने अपनी नौवी रानी के लिए किले से नीचे एक अलग से महल बनाया जोकि  गूजरी महल के नाम से प्रसिद्द हुआ।  राजा साहब की यह नौवीं रानी इतिहास में मृगनयनी के नाम से विख्यात हुई हैं।  प्रसिद्द उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा का उपन्यास मृगनयनी इसी पर आधारित है।
किले के इतिहास से परिचित करता हमारा गाइड 

किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।  

किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।  



किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।  


किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।  

एक फोटो lauranne  के साथ 


दीवारो पर चिपके चमगादड़

किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।  

अब हमारा गाइड किले एक एक भाग से दूसरे भाग और दूसरे से तीसरे भाग में ले जाकर वहाँ के बारे में बता रहा था कि कहाँ पर गीत - संगीत की महफ़िल जमती थी तो एक तरफ नाच- गाने का रंगा -रंग प्रोग्राम होता था तो कही पर शयन गृह था।  गर्मियों में गर्मी न लगे इसके लिए प्राकृतिक कूलर का निर्माण किया गया था।  किले में एक भाग से दूसरे भाग में बात करने के लिए एक अलग तरह के टेलीफोन का आविष्कार किया गया था।
किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।  

गाईड  यहाँ पर एक दीवार के सामने खड़ा है, इसके पीछे पहले सुरंग थी जिसमे से एक रास्ता ओरछा के लिए जाता था व् दूसरा रास्ता आगरा के लिए जाता था।  

किले के अंदर शयनघर  

किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।

किले के अंदर पत्थरो पर  हाथ से काट कर बनाई गई  कलात्मक जालियां , खंभे , बुर्ज।
इस हाल में नृत्य होता था , हमारे गाईड के कहने पर lauranne  की नृत्य मुद्रा में फोटो 

इस हाल में नृत्य होता था , हमारे गाईड के कहने पर lauranne  की नृत्य मुद्रा में फोटो 

किले के निचले हिस्से में बहुत ही संकरी सीढ़ियों से होकर जाना होता है।
पूर्व में तो किले के नीचे का भाग राजा -रानियों  के स्नान घर था एवं अन्य के लिए इस्तेमाल  होता था पर बाद में स्नानघर के टैंक को जौहर के लिए भी इस्तेमाल किया गया था।  इस स्नानघर के दूसरे भाग में बाद में कैदियो को रखा जाने लगा था।  औरंगजेब ने अपने भाई मुराद को भी इसी किले में कैद कर के , उबलते तेल के कढ़ाहे में डाल  कर मार देने का आदेश दिया था पर बाद में इसी तहखाने में उसे फांसी दे दी गई।    मन में विचार आ रहा था कि सत्ता को मोह इंसान को किस कदर हैवान बना देता है कि भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता है।  इस वर्चस्व की लड़ाई में औरंगजेब विजयी हुआ  था।
कभी इस स्थान पर स्नानघर हुआ करता था बाद में इसी जगह जौहर व्रत भी यहीं किया गया था। 

उस समय की टेलीफोन प्रणाली , एक होल इनकमिंग का है और दूसरा आउटगोइंग के लिए।  

कभी इस स्थान पर स्नानघर हुआ करता था बाद में इसी जगह जौहर व्रत भी यहीं किया गया था। 


किले के विभिन्न भागो में घूम  कर हम वापस लौटे।  गाइड को उसकी फीस सौ रूपये दिए,  lauranne  ने कंजूसी करते हुए केवल बीस रूपये ही दिए।  जबकि सारे समय गाइड महोदय lauranne  से  मुखातिब होकर ,  किले के बारे में और उसके इतिहास के बारे में बताते रहे।  हाँलाकि गाइड महोदय खुश थे।


यहाँ से ड्राइवर हमें सास- बहू के मंदिर के ले गया।

किले से ग्वालियर शहर का दृश्य 
सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 

सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 


inside सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 


सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 




सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 

सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 


सास-बहु का मंदिर सही शब्दो में सहस्त्रबाहु का मंदिर 


सास -बहु मंदिर ग्वालियर किले के पूर्वी ओर है। समय के साथ इस मंदिर का नाम बिगड़ कर सास बहु मंदिर  हो गया है।  जबकि  यह मंदिर सास और बहु का नहीं है। यह नाम सहस्त्रबाहु नाम से निकला है जो भगवान विष्णु का दूसरा नाम है। इसके दरवाज़े पर भगवान ब्रम्हा, भगवान विष्णु और देवी की नक्काशियां की हुई हैं।
यहाँ दो मंदिर है जिनमें से एक बड़ा है और एक छोटा। यह मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बना है जिस पर कमल की नक्काशियां की हुई हैं। इसकी संरचना पिरामिड के आकार की है जिसमें कोई मेहराब नहीं है। कहते हैं  इसका निर्माण 11 वीं शताब्दी के कछवाहा राजवंश के राजा महिपाल ने करवाया था।
अब यहाँ पर मंदिर के अंदर कोई  मूर्ति नहीं है।  शायद मुग़ल आक्रंताओ या अन्य आक्रांताओं  ने तोड़ दी थी।
तेली  का मंदिर

तेली  का मंदिर


तेली  का मंदिर


तेली  का मंदिर के बारे में कहा जाता है कि राष्ट्रकूट शासक गोविंदा III (793-814) ने 794 में ग्वालियर फ़ोर्ट पर अधिकार कर लिया और इस मंदिर का पूजा अर्चना कार्य तैलंग ब्राह्मणों को सौप दिया इस वजह से मंदिर का नाम यह पड गया. एक अन्य मतानुसार कुछ तेल के व्यापार करने वालों या तेली जाति के लोगों ने इस मंदिर के निर्माण की शुरूआत की थी इस वजह से इसका नाम तेली मंदिर पडा. पर ऐसा लगता है कि इसका संबंध तैलंगाना (आंध्र प्रदेश) से रहा होगा जो स्थानीय बोली में वक्त के साथ बदलकर वर्तमान में पुकारे जाने वाले नाम "तेली का मंदिर" में बदल गया होगा.
हाँलाकि  यहाँ पर लगे शिलालेख में यही लिखा है कि इसका निर्माण तेल के व्यापारियों ने करवाया था।
इस मंदिर के आस - पास कई छोटे - छोटे से मंदिरो के भग्नावेश भी देखने को मिलते हैं।
 पूरे उत्तर भारत में ग्वालियर किले में स्थित तेली मंदिर में आप द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का अदभुत समन्वय देख सकते है. ग्यारहवीं शताब्दि में बना यह मंदिर ग्वालियर फ़ोर्ट में बना सबसे पुराना मंदिर है।   तेली मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की तरफ़ है. प्रवेश द्वार के एक ओर कछुए पर यमुना व दूसरी ओर मकर पर विराजमान गंगा की मानव आकृतियां हैं. अंदर आयताकार गर्भगृह में छोटा सा मंडप और निचले भाग में 113 छोटे देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मुर्तियां थीं. पर वर्तमान समय में यहां कोई मूर्ति नहीं है।

कहते हैं आर्य द्रविड़ शैली के इस मंदिर को सन 1231 में, यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर का अधिकांश हिस्सा ध्वस्त कर दिया गया था. इसके उपरांत 1881--1883 ई. के मध्य अंग्रेज शासकों द्वारा मंदिर के पुरातात्विक महत्व के मद्देनजर मेजर कीथ के मार्गदर्शन में ग्वालियर किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल [मंदिर] के साथ-साथ तेली मंदिर का भी सरंक्षण करवाया. मेजर कीथ ने ही इधर-उधर बिखरे पड़े भग्नावशेषों को जुटाकर तेली मंदिर के सामने भव्य और आकर्षक द्वार भी बनवाया।

तेली के मंदिर का अवलोकन करने के बाद हमने ड्राइवर से पूछा अब कहाँ चलना है।  बोला अब आप लोगो को गुरूद्वारे ले चलता हूँ।  इस समय तक शाम ढलने लगी थी पहले तो विचार आया कि छोड़ो वापस चलते हैं पर फिर लगा कि जाना चाहिए।  उस समय तक मुझे इस गुरुद्वारे का इतिहास नहीं मालूम था। इसी किले में सिखों के छठे गुरु को मुगलो ने  कैद किया था पर बाद में जहांगीर ने उन्हें रिहा कर दिया था।  कहते हैं गुरु साहब ने रिहा होते वक्त शर्त रखी थी कि मेरे साथ कैद इन हिन्दू  राजाओं को भी रिहा किया जाय।  तब जहाँगीर ने कहा जितने भी राजा आपका कुर्ता पकड़ कर बंदी गृह से  निकल सकते हैं उन्हें छोड़ दिया जायेगा।  कहते हैं उस समय करीब 52 राजाओं ने उनका कुर्ता  पकड़ कर बंदी गृह से मुक्ति पायी थी।  उसी की याद में यहाँ पर एक गुरुद्वारा बना हुआ है।
ड्राइवर ने हमें गुरुद्वारे के पास उतार दिया। गुरूद्वारे के बाहर  फोटो न खींचने के निर्देश वहाँ पर लिखे हुए थे।  पहले तो मन हुआ कि दिन भर की थकान है बाहर से दर्शन करके लौट चलेंगे पर टैक्सी से  उतरते ही गुरूद्वारे के बाहर वातावरण में गूंजती हुई गुरुवाणी की ध्वनि ने नई ऊर्जा का संचार कर दिया।  अब हमने जूते  उतार सर पर पटका बांध कर गुरुद्वारे में प्रवेश किया।
गुरुद्वारे में प्रसाद ग्रहण  करके वापस लौटे।  ड्राइवर ने बताया अब किले का टूर ख़त्म।  उसने  हमें किले से नीचे छोड़ दिया।  यहाँ से टहलते हुए हम बाहर मुख्य सड़क पर पहुँच गए।  वहीं पर एक जगह गोल गप्पे बिक रहे थे।  lauranne  ने पूछा इसका क्या नाम है मैंने कहा यहाँ पर तो गोल गप्पे कहते हैं मुझे नहीं मालूम कि फ़्रांसिसी भाषा में क्या कहते हैं।  कहने लगी मुझे खाना है।  सुन कर मुझे ताज्जुब हुआ क्योकि मेरी जानकारी तो यही थी कि यह लोग चटपटी और तीखी खाने की चीजे पसंद नहीं करते हैं।  परन्तु यह तो उसके विपरीत है।  गोल गप्पे के बाद वहाँ पर बिक रहे चना जोर गर्म का भी उसने स्वाद लिया।  बातो ही बातो में मैंने उसे बताया मै सामाजिक , राजनीतिक विषयो पर लिखता भी हूँ साथ ही साथ विभिन्न यात्राओ पर  घुमक्कड़ डॉट  कॉम  की साईट पर लिखता हूँ।  आज हाने जो घुमक्कड़ी की है इस पर भी लिखूंगा तभी मैंने हर एक जगह के फोटो खींचे है।  अपना मेल आईडी देकर कहने लगी  कि मुझे मेल करना।  मैंने कहा लेकिन मै तो अपनी भाषा हिन्दी में लिखता हूँ।  तब उसने बताया कि उसे भी हिंदी आती है।
शाम ढलने लगी थी मेरी गाडी सात बजे की थी।  सोंचा स्टेशन चला जाय वहीं पर शाम  की चाय पीकर ट्रेन का इन्तजार करेंगे।  मैंने lauranne  को अपना प्रोग्राम बताया।  बोली मै भी साथ चलती हूँ।  रास्ते में वह शहर के फोटो खींचती रही।  स्टेशन के बाहर मार्किट में  हम उतर गए।  यहाँ पर कई छोटे - छोटे रेस्टोरेंट , हलवाई की दूकान आदि हैं।  एक मिठाई की दूकान पर चाय की भी व्यवस्था देख हम उसमे जाकर बैठ गए।  वहाँ काउन्टर पर तरह - तरह की मिठाई देख कर वह उनको खाने के लिए उत्सुक हो गई।  मैंने उसके लिए  मिठाई  , समोसा और दोनों के लिए चाय मँगवाई । मिठाई में उसे रस मलाई बहुत पसंद आयी।  चाय पीकर बाहर आये।  वह और मिठाई खरीदना चाहती थी , मैंने दुकानदार से कहा  आठ - दस  पीस अलग - अलग तरह की मिठाई के पैक करके दे दो।

 चाय और समोसे के साथ   lauranne 

 अँधेरा हो चुका था।  अब मुझे स्टेशन के लिए जाना था।  lauranne का होटल वही पास में लिंक रोड पर था.  मैंने वहाँ पर खड़े  एक ट्रैफिक सिपाही से कहा कि यह विदेशी लड़की है , इस समय अँधेरा हो गया है  इसलिए सावधानी के नाते किसी ऑटो वाले को समझा कर इसके होटल पहुँचवा दो।  सिपाही ने एक ऑटो वाले को रोक कर उसे lauranne  को होटल छोड़ने के लिए बोला साथ ही साथ अपने पर्स से निकल कर ऑटो का भाड़ा भी देने लगा।  यह देख मैंने कहा नहीं - नहीं आप पैसे मत दो , भाड़ा यह स्वयं दे देगी।  वैसे बहुत ख़ुशी हुई कि कुछ सिपाही इतने अच्छे भी होते हैं वर्ना देखने में तो यही आता है कि अपने आप तो मुफ्त में सैर करते ही हैं और अगर कोई जानने वाला  मिल जाय तो उसे भी पैसे नहीं देने देते हैं।
मैंने कहा लाओ तुम्हारी फोटो खींच  लेते हैं अपने लेख में प्रकाशित करूँगा पर  शायद हाथ हिल गया और फोटो साफ नहीं आई।
यह थी मेरी ग्वालियर की सैर हांलाकि बहुत  जगह अभी भी थीं लेकिन एक दिन में इतना ही घूम सका।